शिमला। सीटू, हिमाचल किसान सभा, जनवादी महिला समिति, डीवाईएफआई, एसएफआई, दलित शोषण मुक्ति मंच ने अपनी मांगों व तीन किसान विरोधी कानूनों को लेकर संघर्षरत किसानों के आंदोलन का समर्थन किया है। इन संगठनों ने केंद्र व हरियाणा सरकार द्वारा किये जा रहे किसानों के बर्बर दमन की कड़ी निंदा की है। किसानों के आंदोलन के समर्थन में प्रदेशभर के मजदूरों, किसानों, महिलाओं, युवाओं, छात्रों व सामाजिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़े तबकों द्वारा राज्यभर में प्रदर्शन करके किसानों के साथ एकजुटता प्रकट की। इस दौरान जिला व ब्लॉक मुख्यालयों में जबर्दस्त प्रदर्शन किए गए।
सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा, महासचिव प्रेम गौतम, किसान सभा प्रदेशाध्यक्ष डॉ. कुलदीप तंवर, महासचिव डॉ. ओंकार शाद, महिला समिति प्रदेशाध्यक्ष डॉ. रीना सिंह, सचिव फालमा चौहान, डीवाईएफआई प्रदेशाध्यक्ष अनिल मनकोटिया, सचिव चन्द्रकान्त वर्मा, एसएफआई प्रदेशाध्यक्ष रमन थारटा, सचिव अमित ठाकुर, दलित शोषण मुक्ति मंच संयोजक जगत राम व सह संयोजक आशीष कुमार ने कहा कि केंद्र की मोदी और हरियाणा की खट्टर सरकार किसानों को कुचलने पर आमादा है, जोकि बेहद निंदनीय है। उन्होंने इन सरकारों को तानाशाह करार दिया है। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन को दबाने से स्पष्टतः ज़ाहिर हो चुका है कि ये दोनों भाजपा सरकारें पूंजीपतियों व नैगमिक घरानों के साथ हैं व उनकी मुनाफाखोरी को सुनिश्चित करने के लिए किसानों की आवाज़ को दबाना चाहती हैं जिसे देश का मजदूर-किसान कतई मंज़ूर नही करेगा। उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार किसान विरोधी नीतियां लाकर किसानों को कुचलना चाहती है।
इन नेताओं ने देश के किसानों को ऐतिहासिक आंदोलन के लिए बधाई दी है, जिसमें करोड़ों किसान शामिल हो चुके हैं। लाखों किसान ट्रेक्टरों के साथ आंदोलन के मैदान में हैं। सरकार की लाठी, गोली, आंसू गैस, सड़कों पर खड्डे खोदना, बैरिकेड व पानी की बौछारें भी किसानों के हौंसलों को पस्त नहीं कर पा रही हैं। उन्होंने किसानों के साथ मजदूरों की एकजुटता का आह्वान किया है।उन्होंने कहा कि मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीनों नए कृषि कानून पूर्णतः किसान विरोधी हैं। इसके कारण किसानों की फसलों को कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिए विदेशी और देशी कंपनियों और बड़ी पूंजीपतियों के हवाले करने की साज़िश रची जा रही है। इन कानूनों से फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की अवधारणा को समाप्त कर दिया जाएगा। आवश्यक वस्तु अधिनियम के कानून को खत्म करने से जमाखोरी,कालाबाजारी व मुनाफाखोरी को बढ़ावा मिलेगा। इससे बाजार में खाद्य पदार्थों की बनावटी कमी पैदा होगी व खाद्य पदार्थ महंगे हो जाएंगे। कृषि कानूनों के बदलाव से बड़े पूंजीपतियों और देशी – विदेशी कंपनियों का कृषि पर कब्जा हो जाएगा और किसानों की हालत दयनीय हो जाएगी।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के नए कानूनों से एपीएमसी जैसी कृषि संस्थाएं बर्बाद हो जाएंगी, न्यूनतम समर्थन मूल्य की अवधारणा खत्म हो जाएगी, कृषि उत्पादों की कालाबाज़ारी, जमाखोरी व मुनाफाखोरी होगी, जिससे न केवल किसानों को नुकसान होगा, अपितु आम जनता को भी इसकी मार झेलनी पड़ेगी। यह सब कॉरपोरेट्स को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से किया जा रहा है। आज किसानों को मदद देने के बजाए केंद्र सरकार किसानों को तबाह करने पर तुली हुई है। न तो कृषि बजट में बढ़ोतरी हो रही है, न ही किसानों की सब्सिडी में बढ़ोतरी हो रही है, न ही किसानी के उपकरण किसानों को सरकार की ओर से मुहैया करवाए जा रहे हैं, न ही किसानों के कर्ज़े माफ किये जा रहे हैं और न ही उन्हें लाभकारी मूल्य दिया जा रहा है। स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशें पिछले दो दशकों से केंद्र सरकार के मेजों पर धूल फांक रही हैं व उन्हें लागू नहीं किया जा रहा है। इसलिए बेहद जरूरी हो गया है कि देश के मजदूर, किसान, महिला, युवा, छात्र, सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े हुए तबके पूर्ण एकता बनाकर इस सरकार की चूलें हिलाएं व इसकी पूंजीपति व कॉर्पोरेट परस्त नीतियों पर रोक लगाएं।
