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शिमला। विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानियां ने मंगलवार को नई दिल्ली स्थित संसद भवन में आयोजित दो दिवसीय भारत क्षेत्र राष्ट्रमण्डल संसदीय संघ सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा कि सतत व समावेशी विकास दोनों ही देश के विकास के लिए महत्वूपर्ण हैं। उन्होंने कहा कि सतत एवं समावेशी विकास आज के समय में सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक प्राथमिकताओं में से एक हैं।

सम्मेलन के दौरान पठानिया ने कहा कि सतत विकास का उद्देश्य पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक असंतुलनों को समाप्त कर एक दीर्घकालिक और संतुलित विकास को सुनिश्चित करना है, जबकि समावेशी विकास विशेष रूप से समाज के सभी वर्गों के लिए अवसर प्रदान करने और सामाजिक समानता को बढ़ावा देने पर ध्यान केन्द्रित करना है। 

पठानिया ने कहा कि सतत विकास के लिए समावेशी विकास एक जरूरी आधारशिला है। समावेशी विकास समाज के सभी वर्गों में आर्थिक लाभ को समान रूप से बांटने का उद्देश्य रखता है, जबकि सतत विकास वर्तमान की जरूरतों को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों को भी ध्यान में रखना होगा। 

कुलदीप पठानिया ने कहा कि सतत विकास एक ऐसा विकास मॉडल है जो आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय पहलुओं को संतुलित करके समाज की दीर्घकालिक समृद्वि और खुशहाली को सुनिश्चित करने का प्रयास करता है। यह अवधारणा केवल आज की आवश्यकताओं को पूर्ण करने पर ध्यान ही नहीं देती अपितु आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति को भी ध्यान में रखता है, जबकि समावेशी विकास भी एक ऐसा दृष्टिकोण है जो समाज के सभी वर्गों को समान अवसर प्रदान करता है और विकास के लाभों को व्यापक रूप में वितरित करता है।

कुलदीप पठानिया ने कहा कि हमारे देश के सन्दर्भ में समावेशी विकास की अवधारणा कोई नई बात नहीं है। यदि हम प्राचीन ग्रन्थों का अवलोकन करें तो उनमें भी सब लोगों को साथ लेकर चलने की भावना निहित है। 

“सर्वे भवन्तु सुखिन”, इस बात की पुष्टि की गई है। 90वे के दशक में उदारीकरण की निति के बाद विकास की यह अवधारणा नए रूप में उभरेगी, क्योंकि उदारीकरण के दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ जुड़ने का मौका मिला तथा यह धारणा देश एवं राज्यों की परिधि से बाहर निकलकर वैश्विक सन्दर्भ में अपनी महता बनाए रखने में सफल रही। 

पठानिया ने कहा कि सतत एवं समावेशी विकास में विधायिका की भूमिका महत्वपूर्ण है इसके लिए हमें अपनी प्रतिबद्धता को कायम रखना होगा तथा लोभ-लालच का त्याग कर अपने उद्देश्य को हासिल करने के लिए एक निडर निष्पक्ष तथा कर्तव्य परायण जन प्रतिनिधि बनना होगा। 

पठानिया ने कहा कि नीति निर्धारण में हमें निष्पक्ष होना पड़ेगा तथा समय-समय पर उसकी  समीक्षा कर राष्ट्रहित में यदि जरूरी हो तो उसमें बदलाव भी करना होगा। उन्होंने कहा कि हमें कानून एवं निति बनाने का अधिकार हमारा संविधान देता है, लेकिन देखना यह है कि क्या हम उसकी परिपालना कर भी रहे हैं या मात्र दिखावा ही कर रहे हैं। 

पठानिया ने कहा कि सतत एवं समावेशी विकास के लिए केन्द्र से योजनाएं बननी चाहिए क्योंकि प्रदेश के संसाधनों पर भी संघ का अधिकार है। योजनाएं विकासोन्मुखी होनी चाहिए तथा राज्यों को उनके अधिकारों के हिसाब से उनका लाभ मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि केन्द्र को हमेशा प्रदेश हित का सर्वोपरि रखना होगा ताकि सतत व समावेशी विकास सुनिश्चित किया जा सके। संघ की योजनाएं निष्पक्ष होनी चाहिए तथा राज्यों को अधिक से अधिक लाभ मिलना चाहिए। राज्यों को धन आवंटन उनकी जरूरतों तथा लक्ष्यों के हिसाब से होना चाहिए न कि राजनितिक  आधार पर तभी हम सतत एवं समावेशी विकास सुनिश्चित करेंगे। विधायकों की भूमिका उसके क्रियान्वयन की है। यदि नीति निर्धारण निष्पक्ष होगा तथा आवंटन यथोचित व समुचित होगा तो विधायिका भी अपनी इच्छाशक्ति से अपने लक्ष्य की ओर साकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ सकेगी। 

पठानिया ने कहा कि सदन के अन्दर सरकार के मंत्री कई प्रश्नों तथा चर्चाओं के बाद आश्वासन देते हैं लेकिन हमें इसकी भी समय-समय पर समीक्षा करनी होगी कि सदन में दिया गया आश्वासन फलीभूत हुआ है या नहीं। यह हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली की विश्वसनियता को कायम रखेगा तथा सदन की गरिमा तथा वर्चस्व की सर्वोच्चता बनी रहेगी। 

सम्मेलन के दौरान राष्ट्रमण्डल संसदीय संघ भारत क्षेत्र के चेयरमैन ओम बिरला, उपाध्यक्ष राज्य सभा डॉ. हरिवंश, राज्य विधान मण्डलों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष 25 राज्यों के पीठासीन व उप पीठासीन अधिकारी तथा कई केन्द्र शासित राज्यों के पीठासीन अधिकारी भी मौजूद थे। 

By admin

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