शिमला। संयुक्त किसान मोर्चा के देशव्यापी आह्वान के तहत हिमाचल किसान सभा जो कि अखिल भारतीय किसान सभा की राज्य इकाई है और राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त किसान मोर्चा का एक घटक है, ने भारतीय खाद्य निगम के महाप्रबंधक के मार्फत देश के प्रधानमंत्री एवं प्रदेश के मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन से पूर्व किसान सभा के कार्यकर्ताओं ने भारतीय खाद्य निगम को बचाने, कृषि कानूनों को वापस लेने तथा प्रदेश में अनाजों, फलों, सब्जियों तथा दूध पर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने संबंधी मुद्दों पर जोरदार नारेबाजी की।
इस ज्ञापन के माध्यम से हिमाचल किसान सभा खाद्य एवं कृषि से सम्बन्धित कुछ केन्द्रीय व कुछ राज्य स्तरीय मामलों पर केन्द्र और राज्य सरकारों का ध्यानाकर्षण चाहती है और निम्न बिन्दुओं पर प्रभावी हस्तक्षेप की अपेक्षा भी करती है।
भारतीय खाद्य निगम के द्वारा अनाजों व अन्य फसलों की खरीद से न केवल सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से देश के करोड़ों गरीब परिवारों को सस्ता राशन मुहैया होता है बल्कि इसके माध्यम से देश की खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है। किसी भी आपदा या संकट के समय के लिए देश को खाद्य वस्तुओं के मामले में आत्मनिर्भर होना देश की सुरक्षा के लिए अति आवश्यक है।
परन्तु यह महसूस किया गया है कि धीरे-धीरे न केवल सार्वजनिक वितरण प्रणाली को कमज़ोर और सीमित किया जा रहा है साथ ही केन्द्र सरकार की ओर से भारतीय खाद्य निगम के लिए जिस तरह के दिशानिर्देश जारी किए जा रहे हैं उनसे खाद्य निगम पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। खाद्य सुरक्षा के लिए ज़रूरी खाद्य भण्डारण में कमी आएगी। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव किसानों और उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।
राष्ट्रीय मुद्दे
1. सरकार की ओर से भारतीय खाद्य निगम से किसानों से फसलों की खरीद के समय गुणवता के मानकों में बदलाव करने के लिए कहा जा रहा है। ये नियम बनाने और खाद्य निगम को निर्देश देने से पहले नये मानकों को तय करने में न तो किसानों की राय ली गई और न ही अन्य स्टेकहोल्डर इस फैसले पर चर्चा में शामिल किए गए। खरीद के नियमों में बिना सलाह-मशविरे के फैसला लागू करके सरकार उसी भूल की पुनरावृति करने जा रही है जो वर्तमान कृषि कानूनों को लागू करने में की गई थी जिसका खामियाज़ा न केवल किसानों को भुगतना पड़ेगा बल्कि उपभोक्ताओं पर भी इसकी मार पड़ेगी।
2. न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद करने के लिए फर्द या ज़मीन के कागज़ दिखाने की शर्त लगाकर भी सरकार किसानों की फसल की सरकारी खरीद को सीमित करना चाहती है। देश में जहां भूमि सुधार नहीं हुए हैं वहां किसान ज़मीन को लीज़ पर लेकर खेती कर रहे हैं। हिमाचल जैसे राज्यों में जहां जोतें बहुत छोटी हैं वहां भी किसान अपनी ज़मीन के साथ दूसरों की ज़मीन पर खेती करके अपना साल भर का गुज़ारा करता है। इन परिस्थितियों में ज़मीन के मालिकाना हक के कागज़ात के अनुपात में फसल की खरीद करना किसी भी सूरत में तर्कसंगत नहीं है।
वहींस इसी फैसले में यह भी कहा जा रहा है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य का पैसा सीधा लाभार्थी के खाते में जाएगा। इसमें लीज़ पर ली गई ज़मीन या बटाई में ली गई ज़मीन की फसल पर मिलने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसका हक होगा इस पर कोई स्पष्टता या नीति नहीं है।
इन फैसलों से स्पष्ट होता है कि सरकार खरीद के मानक तय करके अप्रत्यक्ष तौर पर किसानों से फसलों की खरीद को सीमित करना चाहती है। साथ ही साथ भारतीय खाद्य निगम और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को कमज़ोर करना चाहती है। इससे उपभोक्ताओं पर भी बुरा असर पड़ेगा और देश की खाद्य सुरक्षा भी प्रभावित होगी। हिमाचल किसान सभा केन्द्र के इन फैसलों का विरोध करती है और तुरन्त प्रभाव से इन्हें वापिस लेने की मांग करती है।
राज्य स्तर के मुद्दे
हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण योगदान है। प्रदेश के 90 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं तथा 62 प्रतिशत लोग सीधे तौर पर कृषि पर निर्भर है। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि व इससे जुड़े क्षेत्रों का लगभग 13.62 प्रतिशत योगदान है। 5.43 लाख हैक्टेयर भूमि पर काश्त होती है। प्रदेश में 88.84 प्रतिशत किसान सीमान्त तथा लघु वर्ग के हैं जिनके पास बोई जाने वाली भूमि का 54.18 प्रतिशत भाग है। 10.84 प्रतिशत किसान मध्यम श्रेणी से हैं। केवल 0.30 प्रतिशत किसान ही बड़े किसानों की श्रेणी में आते हैं।
1. यह सही है कि प्रदेश की आर्थिकी में फलों विशेषतौर पर सेब का बहुत बड़ा योगदान है। पिछले डेढ़-दो दशकों में सब्ज़ी के योगदान को भी रेखांकित किया गया है। प्रदेश में अनाज भी अच्छी खासी आबादी की आय का साधन है। परन्तु प्रदेश में खरीद केन्द्रों और भण्डारण की उपयुक्त सुविधा न होने के कारण प्रदेश के किसानों को अपना गेहूं, धान, चावल व मक्की पड़ौसी प्रदेशों उत्तराखण्ड, हरियाणा या पंजाब की मण्डियों में बेचना पड़ता है। आने वाले समय के लिए जिस ढंग से फसलों की सरकारी खरीद को नियंत्रित किये जाने की कोशिश की जा रही है, उन स्थितियों में प्रदेश के किसान को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा।
2. वहीं दूसरा मुद्दा जो प्रदेश सरकार के ध्यान में लाने की आवश्यकता है वह प्रदेश में उगाई जाने वाली मक्की की फसल का है। प्रदेश के अधिकतर हिस्सों में मक्की की फसल पैदा होती है। 80 प्रतिशत वर्षा जल पर आधारित प्रदेश की खेती में मक्की का योगदान बहुत ज्यादा हो सकता है यदि इसे व्यावसायिक दृष्टि से विकसित किया जाए।
हिमाचल किसान सभा अपनी मांगों को पुनः रेखांकित करते हुए उचित कदम की मांग करती है कि
1. खरीद के समय गुणवता के मानकों में बदलाव को वापिस लो।
2. न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद करने के लिए फर्द या ज़मीन के कागज़ दिखाने की शर्त वापिस लो।
3. भारतीय खाद्य निगम की भण्डारण क्षमता बढ़ाओ और कर्मचारियों की संख्या को भी तर्कसंगत बनाओ।
4. न्यूनतम समर्थन मूल्य का पैसा ज़मीन के मालिक के खाते में सीधा हस्तांतरित करने से पहले ज़मीन के कागज़ के आधार पर सरकारी खरीद के नियम में बदलाव किया जाए।
5. प्रधानमंत्री महोदय 2014 के अपने वायदे को निभाते हुए हिमाचल प्रदेश के उत्पादों के लिए प्रोसेसिंग इकाइयां स्थापित करने के लिए केन्द्र से आर्थिक मदद दें।
6. प्रदेश में स्थानीय उत्पादों फल, सब्ज़ी, मसालों, दूध आदि के लिए समर्थन मूल्य की घोषणा करे।
7. मक्की को सार्वजनिक वितरण प्रणाली का हिस्सा बनाए तथा मक्की पर आधारित उद्योग स्थापित करे।
भारतीय खाद्य निगम के महाप्रबंधक ने अपने अधिकारियों के साथ आकर प्रदर्शन के दौरान ज्ञापन लिया तथा सकारात्मक तरीके से किसानों की मांगों पर प्रमुखता से गौर करते हुए प्रदेश एवं केन्द्र सरकार को सुझावों सहित भेजने का आश्वासन दिया। प्रदर्शन में जयशिव ठाकुर, अमर ठाकुर, हीरानंद शांडिल, मोलक राम ठाकुर, विजय शांडिल, अमर सिंह, परमानंद शर्मा, विद्यादत शर्मा, नेकराम, केवल शर्मा, अनोखी राम, रति राम, मस्त राम, कपिल शर्मा, अंबी ठाकुर, सुरेश पुण्डीर, अनिल पंवर, जोगिन्द्र, जीयानंद शर्मा, देवेन्द्र कंवर आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
