शिमला। माकपा के मजदूर संगठन सीटू की राज्य कमेटी ने हिमाचल प्रदेश सरकार के उस सर्कुलर व अधिसूचना की कड़ी निंदा की है, जिसमें उसने कर्मचारियों के सोशल, इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया में कर्मचारी विरोधी नीतियों पर बोलने पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाया है। साथ ही उनके खिलाफ अनुशासनात्मक व दंडात्मक कार्रवाई की कड़ी चेतावनी दी है। सीटू के मुताबिक सरकार का यह निर्णय पूर्णतः तनाशाहीपूर्वक है तथा संविधान व लोकतंत्र विरोधी है।
सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा व महासचिव प्रेम गौतम ने कहा है कि प्रदेश सरकार की यह अधिसूचना कर्मचारी विरोधी है व कर्मचारी आंदोलन को दबाने की साज़िश है, जिसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने सभी ट्रेड यूनियनों व कर्मचारी यूनियनों से आह्वान किया कि सरकार के इस निर्णय के खिलाफ एकजुट हों व इसका कड़ा विरोध करें। उन्होंने प्रदेश सरकार से मांग की कि इस आदेश को तुरन्त वापिस लिया जाए, अन्यथा कर्मचारी व ट्रेड यूनियनें इसके खिलाफ सड़कों पर उतरने को बेबस होंगे। उन्होंने कहा कि यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 19 का खुला उल्लंघन है जो किसी भी व्यक्ति को अपनी यूनियन बनाने, भाषण देने, अपनी बात उठाने व बोलने की आज़ादी देता है व इस तरह के किसी भी तरह के प्रतिबंध के खिलाफ है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघन है, जो हर व्यक्ति को गरिमामयी जीवन जीने का अधिकार देता है व इसके लिए लोकतांत्रिक अधिकार देता है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 का भी उल्लंघन है, जोकि हर व्यक्ति को राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक समानता का अधिकार देता है।
सीटू नेताओं ने कहा कि यह भारत में 1926 में बने ट्रेड यूनियन एक्ट का घोर उल्लंघन है जो हर मजदूर व कर्मचारी को अपनी यूनियन बनाने, अपनी मांग को उठाने, सरकार से अपनी आर्थिक मांगों को रखने व सरकार की मज़दूर व कर्मचारी विरोधी नीतियों पर बात रखने का अधिकार देता है। आधुनिक युग में मांग-पत्र देने के साथ ही कोई भी व्यक्ति, मजदूर व कर्मचारी अपनी मांगों को इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट व सोशल मीडिया पर भी उठा सकता है व सरकारी की कर्मचारी विरोधी नीतियों पर सवाल उठा सकता है। हमारी व्यवस्था में मीडिया को चौथे स्तम्भ का दर्जा हासिल है व उस पर अपनी मांग उठाना अथवा सरकारी की कर्मचारी विरोधी नीतियों पर उंगली उठाना कोई संविधान विरोधी कार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि इस दिशा में त्रिपुरा उच्च न्यायालय भी कुछ वर्ष पूर्व यह निर्णय दे चुका है कि कर्मचारियों द्वारा राजनीतिक रैलियों में भागीदारी करना व अपनी मांगों को सोशल मीडिया सहित विभिन्न मंचों पर उठाना संविधान सम्मत है। इसलिए प्रदेश सरकार को तुरन्त यह सर्कुलर वापिस लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार के सर्कुलर से साफ हो रहा है कि सरकार अपनी मजदूर व कर्मचारी विरोधी नीतियों को छुपाने व उन्हें आगे बढ़ाने के लिए इस तरह के आदेशों के ज़रिए दमन का सहारा लेना चाहती है।
मेहरा व गौतम ने कहा कि यह सब केंद्रीय सिविल सर्विस (आचरण) नियम 1964 व सेवा शर्तों के नियमों की आड़ में किया जा रहा है, जोकि बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि प्रदेश सरकार की 17 अप्रैल 2021 की अधिसूचना के अनुसार अगर कोई भी कर्मचारी इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट व सोशल मीडिया पर अपनी मांगों को लेकर व सरकार की कर्मचारी विरोधी नीतियों के खिलाफ बयानबाजी करता है तो उस पर केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम 1965 की आड़ में अनुशासनात्मक अथवा दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि यह सब घोर तानाशाही है, जिसके लिए लोकतंत्र में कोई जगह नहीं है।
