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शिमला। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की लोकल कमेटी शिमला ने आज आयुक्त नगर निगम के कार्यालय के बाहर शिमला शहर में सरकार व नगर निगम शिमला द्वारा पीने के पानी व कूड़े के भारी भरकम बिलों व शिमला शहर की पेयजल व्यवस्था के निजीकरण के लिए किये जा रहे कार्य के विरोध में प्रदर्शन किया। माकपा ने कहा कि जिस प्रकार से सरकार व्यवस्थित तरीके से इसका निजीकरण कर रही है उसकी कड़ी निंदा करती है। पार्टी की मांग है कि सरकार व नगर निगम द्वारा दिये गए इन अनियमित पानी व कूड़े के बिलों तथा सरकार शहर की पेयजल व्यवस्था के निजीकरण के निर्णय को तुरंत वापिस ले और इसे पूर्व की भांति नगर निगम को सौंपा जाए। क्योंकि 74वें संविधान संशोधन के अनुरूप भी पेयजल की व्यवस्था करना नगर निगम का ही उत्तरदायित्व है। 

इस मामले को लेकर माकपा ने डीसी आफिस के बाहर धरना प्रदर्शन किया और राज्य सरकार और नगर निगम के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की। विरोध प्रदर्शन मे पार्टी जिला सचिव संजय चौहान, लोकल कमेटी सचिव बलबीर पराशर, राज्य कमेटी सदस्य डा. राजेंद्र चौहान, फालमा चौहान, जिला कमेटी सदस्य बाबू राम, किशोरी डटवालिया, सोनिया, जगमोहन ठाकुर, विनोद विरसांटा, रमन थारटा, अमित ठाकुर, अनिल, मोहित, बालक राम, नेहा ठाकुर, रजनी, गौरव, अनिल पंवर, राकेश, प्रकाश, विरेन्द्र, सुभाष, जगदीश, कल्याण, प्रेम, पवन, रिंपल चौहान, सरिता, नंदिनी, शारदा, दलीप, पवन शर्मा, रविन्द्र, रीना, पविंद्र आदि मौजूद रहे। सीपीएम की लोकल कमेटी शिमला सरकार व नगर निगम की शिमला शहर की पेयजल व्यवस्था के निजीकरण की नीतियों के विरुद्ध जनता व विभिन्न संगठनों के साथ मिल कर आंदोलन चलाएगी। यह आंदोलन तब तक चलाया जाएगा जब तक कि सरकार पेयजल व्यवस्था के इस निजीकरण के निर्णय को वापिस नहीं लेती और इस कंपनी को निरस्त कर पेयजल की व्यवस्था संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नगर निगम शिमला के अधीन नहीं करती। पार्टी जनता से आग्रह करती है कि सरकार व नगर निगम की इन जनविरोधी नीतियों को पलटने के लिए संगठित होकर विरोध करें। इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि बीजेपी की नीतियां सदा ही मूलभूत सेवाओं, जिनमें पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क आदि के निजीकरण की ही पक्षधर रही है। वर्ष 2012 में भी तत्कालीन बीजेपी की प्रदेश सरकार ने शिमला शहर के पेयजल की व्यवस्था निजी हाथों में देने के लिए टेंडर तक कर दिया था। जिसे पूर्व नगर निगम ने अगस्त, 2012 में सदन में प्रस्ताव लाकर निरस्त करवाया था और पेयजल की व्यवस्था नगर निगम शिमला के अधीन ही रखकर इसको सुदृढ़ करने का कार्य किया। 

माकपा शिमला कमेटी के सचिव बलबीर पराशर ने कहा कि वर्ष 2017 में जबसे नगर निगम व सरकार में बीजेपी सत्तासीन हुई है, तबसे ही सरकार ने पेयजल की व्यवस्था के निजीकरण के लिए कार्य किया गया है। पूर्व नगर निगम ने वर्ष 2016 में सरकार से एक लंबे संघर्ष के पश्चात शिमला शहर की सभी पेयजल योजनाओं को नगर निगम के अधीन लेकर इसके प्रबंधन के लिए तत्कालीन सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य विभाग व शहरी विभाग को सम्मिलित कर एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम ग्रेटर शिमला वॉटर सप्लाई एंड सीवरेज सर्कल (GSWSSC) का गठन किया था और इसका प्रबंधन नगर निगम शिमला के अधीन ही रखा गया था। इसे विश्व बैंक ने भी मान्य किया था और शहर की सभी पेयजल व सीवरेज परियोजनाएं, जिसमें शिमला शहर के लिए पेयजल व्यवस्था के जीर्णोद्धार व सीवरेज व्यवस्था करने के लिए वर्ष 2016 में स्वीकृत विश्व बैंक पोषित 125 मिलियन डॉलर की परियोजनाओं को भी इसी के द्वारा लागू किया जाना था। लेकिन वर्ष 2018 में बीजेपी की नगर निगम ने सरकार के दबाव में आकर इस ग्रेटर शिमला वॉटर सप्लाई एंड सीवरेज सर्कल को समाप्त कर एक कंपनी शिमला जल प्रबंधन निगम लिमिटेड (SJPNL) का गठन किया और पेयजल की व्यवस्था के निजीकरण की नींव रखी गई। पराशर ने कहा कि सरकार व नगर निगम का यह निर्णय असंवैधानिक तथा जन विरोधी है, क्योंकि एक तो यह नगर निगम के संवैधानिक अधिकारों का हनन है दूसरा जबसे सरकार व नगर निगम ने शहर की पेयजल की व्यवस्था इस कंपनी को सौंपी है तबसे न तो पेयजल व्यवस्था सुचारू रूप से चलाई गई है और न ही समय पर पानी के बिल दिये जा रहे हैं। वर्ष 2018 के पेयजल संकट से शहर की बदनामी दुनिया में हुई और अब जो पानी के बिल कंपनी द्वारा दिये जा रहे हैं वह 8-9 महीनों के बिल हजारों व लाखों रुपए के दिये जा रहे हैं। जोकि बिल्कुल भी तर्कसंगत व न्याय उचित नहीं है और शहर की जनता इसका विरोध करती आ रही है। 

By admin

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