Spread the love

सीईईडब्ल्यू और इसीमोड के अध्ययन में सामने आई ग्रामीणों की पहल, कहीं किसान बदल रहे फसलें तो कहीं महिलाएं पुनर्जीवित कर रही हैं जल स्रोत 

25 अनुकूलन समाधानों की पहचान, 30 से अधिक सरकारी नीतियों और योजनाओं से मिल सकती है मदद 

शिमला। हिमाचल प्रदेश के गांव जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए अपने स्तर पर प्रभावी कदम उठा रहे हैं। मंडी, कुल्लू, सिरमौर और शिमला जिलों की 12 ग्राम पंचायतों में किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि ग्रामीण समुदाय बदलते मौसम के अनुरूप अपनी खेती, जल संरक्षण और आपदा प्रबंधन की रणनीतियों में बदलाव कर रहे हैं। कहीं किसान पारंपरिक फसलों की जगह नई फसलों को अपना रहे हैं तो कहीं महिला समूह प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने में जुटे हैं।

काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) ने इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (इसीमोड) के सहयोग से यह अध्ययन किया है। शनिवार को शिमला के होटल पीटरहॉफ में आयोजित बहु-हितधारक संवाद में रिपोर्ट जारी की गई। इसे एचपीएमसी एवं हिमाचल प्रदेश एग्रो इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन के प्रबंध निदेशक दुनी चंद राणा और अतिरिक्त सचिव निशांत ठाकुर ने जारी किया।

अध्ययन के अनुसार, कुल्लू के बजौरा में किसान सेब के विकल्प के रूप में अनार और जापानी फल (परसिमन) की खेती की ओर बढ़ रहे हैं। सिरमौर के परारा में किसान सेब के साथ लहसुन की एकीकृत खेती अपना रहे हैं। वहीं, शिमला के संधू में 20 से अधिक परिवार प्राकृतिक खेती को अपना चुके हैं। किसानों का मानना है कि प्राकृतिक खेती से उन्हें चरम मौसमी परिस्थितियों का सामना करने में भी मदद मिल रही है।

जल संरक्षण के क्षेत्र में सिरमौर की थाना कशोगा पंचायत में महिला समूहों ने उल्लेखनीय पहल की है। यहां पहले 35 बारहमासी बावड़ियां थीं, लेकिन घटते जल स्रोतों के कारण इनकी संख्या घटकर 10 रह गई। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद महिला समूहों ने बावड़ियों की नियमित सफाई और पुनर्जीवन का अभियान शुरू किया। अब तक पांच बावड़ियों को पुनर्जीवित किया जा चुका है, जबकि अन्य के संरक्षण का कार्य जारी है। इसी तरह शिमला के निकट शोघी पंचायत में वर्ष 2023 में आई बाढ़ और भूस्खलन के बाद ग्राम आपदा प्रबंधन समिति गठित की गई। ग्रामीणों को प्राथमिक चिकित्सा और सुरक्षित निकासी का प्रशिक्षण भी दिया गया है।

अध्ययन में समुदायों और अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श के बाद पांच क्षेत्रों में 25 ऐसे समाधान सुझाए गए हैं, जिनसे जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के प्रभावों को पहले ही कम किया जा सकता है। इन्हें लागू करने के लिए 30 से अधिक मौजूदा सरकारी नीतियों और योजनाओं का लाभ उठाने की सिफारिश की गई है। साथ ही ग्राम पंचायत विकास योजनाओं में जलवायु अनुकूलन और आपदा प्रबंधन को शामिल करने पर जोर दिया गया है। 

इस मौके पर दुनी चंद राणा ने कहा कि हिमाचल में अचानक बाढ़, बादल फटने और भारी बारिश की घटनाएं बागवानी, पर्यटन, बुनियादी ढांचे और स्थानीय आजीविका को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में विकास योजनाओं में भविष्य के जोखिमों का आकलन और उनसे निपटने की तैयारी जरूरी है।

उधर, निशांत ठाकुर ने कहा कि हालिया बाढ़ और भूस्खलन से प्रदेश को 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। अब सरकार का जोर आपदा के बाद राहत पहुंचाने के बजाय पहले से तैयारी करने पर है। इसके लिए पंचायत स्तर पर आपदा प्रबंधन योजनाएं तैयार की जा रही हैं।

सीईईडब्ल्यू की श्रेया वधावन ने कहा कि स्थानीय लोगों की पहल और उन्हें संस्थागत सहयोग मिलने से अनुकूलन के प्रयास अधिक प्रभावी होते हैं। इसीमोड की डॉ. अमीना महर्जन और एचआईटीए के कार्यकारी निदेशक राजीव अहल ने भी जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए स्थानीय अनुभवों को राज्य और राष्ट्रीय स्तर की नीतियों से जोड़ने की आवश्यकता बताई। 

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You missed