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शिमला। ‘खेती बचाओ, उद्योग बचाओ, भारत बचाओ’ के नारे के साथ सीटू और हिमाचल किसान सभा के आह्वान पर सोमवार को शिमला समेत प्रदेशभर में मजदूर-किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किए गए। शिमला में जेल भरो आंदोलन, जबकि रामपुर और नाहन में चक्का जाम सहित प्रदेश के जिला व ब्लॉक मुख्यालयों समेत करीब 25 स्थानों पर रैली, धरने और प्रदर्शन आयोजित किए गए। इनमें हजारों लोगों ने भाग लिया। 

शिमला में हुए जेल भरो आंदोलन में सीटू, हिमाचल किसान सभा, सेब उत्पादक संघ, पेंशनर एसोसिएशन, एसएफआई, जनवादी महिला समिति, डीवाईएफआई, एआईएलयू, दलित शोषण मुक्ति मंच और शिमला नागरिक सभा समेत कई संगठनों के कार्यकर्ता शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने चार लेबर कोड, यूरोपीय संघ व इंग्लैंड के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों तथा भारत-अमेरिका ट्रेड डील का विरोध किया।

इसके अलावा तहबाजारी को उजाड़ने, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, नई शिक्षा नीति, आउटसोर्स नीति, संसद और विधानसभा में महिला आरक्षण लागू करने तथा पेपर लीक आंदोलन के दौरान छात्रों और युवाओं पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने की मांग को लेकर भी प्रदर्शन किया गया।

शिमला में प्रदर्शन से पहले आंदोलनकारियों ने जैन धर्मशाला, रिज मैदान और इवनिंग कॉलेज से तीन अलग-अलग रैलियां निकालीं। ये रैलियां रिपोर्टिंग रूम के पास पहुंचकर जनसभा में तब्दील हो गईं। यहां काफी देर तक प्रदर्शन और केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ नारेबाजी की गई। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी गिरफ्तारियां देने के लिए पहुंचे, लेकिन जिला प्रशासन की ओर से कोई गिरफ्तारी नहीं की गई। प्रशासन की ओर से आंदोलनकारियों को समझाने का प्रयास भी किया गया, लेकिन प्रदर्शनकारी जेल भरो आंदोलन पर डटे रहे।

26 नवंबर से बड़े संघर्ष की चेतावनी 

रिपोर्टिंग रूम के बाहर आयोजित जनसभा को संबोधित करते हुए सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा, कोषाध्यक्ष जगत राम, सेब उत्पादक संघ के प्रदेशाध्यक्ष सोहन सिंह ठाकुर और हिमाचल किसान सभा नेता संदीप वर्मा ने कहा कि मोदी सरकार की किसान, मजदूर विरोधी और कॉरपोरेटपरस्त नीतियों के खिलाफ निर्णायक संघर्ष का समय आ गया है। उन्होंने कहा कि 10 अगस्त का आंदोलन केवल एक दिन का विरोध नहीं है, बल्कि किसानों और मजदूरों के बड़े संघर्ष की तैयारी है। उन्होंने घोषणा की कि 26 नवंबर 2026 से देशभर में ‘खेती बचाओ, उद्योग बचाओ और भारत बचाओ’ के नारे के साथ व्यापक संघर्ष शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि 26 नवंबर वही दिन है, जब वर्ष 2020 में ऐतिहासिक किसान-मजदूर आंदोलन की शुरुआत हुई थी और इस आंदोलन ने देश में किसान-मजदूर एकता की ताकत साबित की थी। 

लेबर कोड से 74 फीसदी मजदूरों के बाहर होने का दावा

वक्ताओं ने आरोप लगाया कि चार लेबर कोड लागू होने से मजदूरों के अधिकार कमजोर होंगे और 74 प्रतिशत मजदूर श्रम कानूनों के दायरे से बाहर हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि मुक्त व्यापार समझौतों और भारत-अमेरिका ट्रेड डील से देश की खेती और उद्योग संकट में पड़ेंगे। हिमाचल में सेब और अन्य फलों की खेती पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका जताई गई। उन्होंने कहा कि उद्योगों पर संकट आने से मजदूरों की छंटनी बढ़ेगी।

वक्ताओं ने कहा कि किसानों को उनकी उपज का कानूनी रूप से गारंटीकृत न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल रहा है। वहीं खेतिहर मजदूर और श्रमिक महंगाई, बेरोजगारी और असुरक्षित रोजगार के बीच जीवनयापन करने को मजबूर हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि दूसरी ओर कॉरपोरेट घरानों को खेती, उद्योग, बिजली और सार्वजनिक संसाधनों पर लगातार बढ़ता नियंत्रण दिया जा रहा है।

42 हजार रुपये न्यूनतम मजदूरी की मांग 

आंदोलनकारियों ने चारों लेबर कोड रद्द करने और सभी मजदूरों के लिए कम से कम 42 हजार रुपये मासिक मजदूरी सुनिश्चित करने की मांग की। उन्होंने मुक्त व्यापार समझौतों को स्वीकार नहीं करने और भारतीय किसानों के हितों की रक्षा करने की मांग उठाई।

किसानों के लिए सी2+50 प्रतिशत के आधार पर सभी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी और सुनिश्चित सरकारी खरीद का कानून बनाने की मांग भी की गई। साथ ही कॉरपोरेट को खेती से बाहर रखने, किसानों के जमीन और आजीविका के अधिकारों की रक्षा करने तथा किसानों की व्यापक कर्जमाफी की मांग की गई।

मनरेगा में 200 दिन काम और 700 रुपये मजदूरी की मांग 

सीटू और किसान सभा ने मनरेगा को मजबूत करने तथा खेतिहर मजदूरों को 200 दिन का रोजगार और 700 रुपये प्रतिदिन मजदूरी देने की मांग की। आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को 25 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग भी उठाई गई। वक्ताओं ने राज्यों के संघीय अधिकारों की रक्षा करने, डिविजिबल पूल में राज्यों की हिस्सेदारी 31 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने तथा सेस और सरचार्ज को भी इसमें शामिल करने की मांग की। 

प्री-पेड स्मार्ट मीटर वापस लेने की मांग 

प्रदर्शनकारियों ने बिजली के निजीकरण को बंद करने और किसानों तथा उपभोक्ताओं पर लगाए जा रहे प्री-पेड स्मार्ट मीटर वापस लेने की मांग की। इसके अलावा सीड बिल, 2025 को लागू नहीं करने और किसानों के बीज अधिकारों की रक्षा करने की मांग भी उठाई गई। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ किसान, मजदूर, कर्मचारी, युवा, महिलाएं और अन्य वर्गों को एकजुट कर आने वाले समय में आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।

By admin

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