शिमला। कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं विधायक कुलदीप सिंह राठौर ने भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच 27 अप्रैल 2026 को हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) पर गहरी चिंता व्यक्त की है़। उन्होंने कहा कि इससे हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर और उत्तराखंड के सेब उत्पादकों की आजीविका पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
राठौर ने कहा कि इस समझौते के तहत भारत ने टैरिफ रेट कोटा के अंदर न्यूज़ीलैंड से आयात होने वाले सेब पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 50 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी कर दी है। पहले वर्ष में 32,500 मीट्रिक टन (करीब 16.25 लाख बॉक्स) आयात की अनुमति दी गई है, जो छठे वर्ष तक बढ़कर 45,000 मीट्रिक टन (लगभग 22.5 लाख बॉक्स) हो जाएगी। यह आयात अप्रैल से अगस्त के बीच होगा और न्यूनतम आयात मूल्य यूएस डॉलर 1.25 प्रति किलोग्राम तय किया गया है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब हिमालयी राज्यों के सेब उत्पादक पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में जहां औसत उत्पादकता 7-8 टन प्रति हेक्टेयर है, वहीं न्यूज़ीलैंड में यह 50-70 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच जाती है। इस भारी अंतर के कारण स्थानीय किसान प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकते हैं।
राठौर ने बताया कि भारत में सेब उत्पादन का लगभग 76-77 फीसदी हिस्सा जम्मू-कश्मीर से आता है, जबकि हिमाचल प्रदेश 21-22 फीसदी योगदान देता है। हिमाचल में 1.15 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में सेब की खेती होती है और लगभग 2.5 लाख परिवार इससे जुड़े हुए हैं। राज्य की बागवानी आय का करीब 8 फीसदी हिस्सा सेब से ही आता है।
उन्होंने कहा कि न्यूज़ीलैंड के सेब मई से बाजार में आने लगते हैं, जिससे नियंत्रित वातावरण (सीए) स्टोरेज से निकलने वाले सेब और हिमाचल के शुरुआती व मध्य सीजन के ताजे सेबों की कीमतों पर सीधा दबाव पड़ेगा। 32,500 मीट्रिक टन का शुरुआती आयात कोटा भी बाजार संतुलन बिगाड़ सकता है।
कांग्रेस प्रवक्ता ने केंद्र सरकार से मांग की कि आयात कोटा और न्यूनतम मूल्य की सख्त निगरानी सुनिश्चित की जाए, साथ ही कोल्ड स्टोरेज, ग्रेडिंग और परिवहन ढांचे को मजबूत किया जाए। उन्होंने किसानों को आधुनिक तकनीक और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने तथा भविष्य में ऐसे किसी भी समझौते से पहले किसान संगठनों से व्यापक परामर्श करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
राठौर ने कहा कि सेब उद्योग केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि पहाड़ी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जो लाखों लोगों की आजीविका का आधार है। उन्होंने चेतावनी दी कि संतुलित व्यापार नीति के बिना यह समझौता स्थानीय किसानों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।
