शिमला। संयुक्त किसान मोर्चा के देशव्यापी आह्वान पर प्रदेश में हिमाचल किसान मंच के बैनर तले हिमाचल किसान सभा, सीटू, महिला समिति, नौजवान सभा, एसएफआई, दलित शोषण मुक्ति मंच, विज्ञान मोर्चा व अन्य संगठनों ने मिलकर भारत बंद में हिस्सा लिया। इस दौरान पूरे प्रदेश में जिला, खण्ड एवं तहसील स्तर पर विरोध प्रदर्शन किये गए। इस मौके पर शिमला, रामपुर तथा ठियोग में चक्का जाम किया गया। राजधानी शिमला में विक्ट्री टनल के पास किए गए चक्का जाम में किसानों, मजदूरों, महिलाओं, नौजवानों व छात्रों ने हिस्सा लिया और इसे आम जनता का भी समर्थन प्राप्त हुआ। हिमाचल किसान सभा ने कृषि कानूनों को किसान विरोधी बताया।
किसान सभा के राज्य अध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह तंवर ने कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग की। उन्होंने कहा कि दिल्ली में किसान डेरा डालकर बैठे हैं जो अपनी मांगें हासिल किए बगैर नहीं जाएंगे। हालांकि हिमाचल के किसान भी इस आंदोलन से अछूते नहीं हैं, क्योंकि इन कृषि बिलों के खिलाफ 26-27 नवम्बर 2020 को अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन के तहत हिमाचल प्रदेश में हर जिला में किसान-मजदूर संगठनों ने अपनी जबरदस्त भागीदारी दी थी।
डॉ. तंवर ने कहा कि सरकार को कृषि कानूनों को वापस लेकर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक अनाज के साथ फल व सब्जियों पर भी न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी गारंटी देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हिमाचल में सेब का किसान आज भारी संकट से गुजर रहा है। वहीं पर सब्जी व अनाज में शामिल छोटा किसान भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ है।वहीं, मजदूरों के संगठन सीटू के राज्याध्यक्ष विजेन्दर मेहरा ने आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि अगर केंद्र सरकार ने किसानों की मांगें पूरी नहीं की तो प्रदेश के हर जिले से किसान व मजदूर दिल्ली जाएंगे और किसान आंदोलन में हिस्सा लेंगे। उन्होंने कहा कि किसान मजदूरों की एकता इस भाजपा सरकार की सत्ता से बेदखली करेगी। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में बड़ी संख्या में हिमाचल के किसान मजदूर इस आंदोलन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कराएंगे।
किसानों की सभी मांगें जायज, केंद्र सरकार के कृषि कानून पूरी तरह किसान विरोधी
डॉ. तंवर ने कहा कि हिमाचल में एमएसपी के तहत केवल 3 फसलों गेहूं, धान व मक्की ही आती हैं, लेकिन इसके लिए एफसीआई के तहत कोई सरकारी खरीद की न होने से किसानों को कोई लाभ नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि प्रदेश में मक्की की कुल 7 लाख मीट्रिक टन से अधिक पैदावार होने तथा पांच लाख मीट्रिक टन बाजार के लिए उत्पादन होता है, लेकिन खरीद व्यवस्था न होने से ओने-पौने दामों पर बेचना पड़ता है। उन्होंने कहा कि 2014 के चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी ने हिमाचल में आकर रैलियों में घोषणा की थी कि यहां के किसानों को फल, सब्जी, दूध, ऊन, शहद, आदि उत्पादों पर भी समर्थन मूल्य मिलेगा, लेकिन आज सत्ता में आने के बाद एमएसपी को ही खत्म करने का काम किया जा रहा है।
जम्मू कश्मीर की तर्ज पर ए ग्रेड के लिए 60 रुपए, बी ग्रेड के 44 रुपए तथा सी ग्रेड के 24 रुपए प्रति किलो की दर से दाम दिए जाए
डॉ. तंवर ने कहा कि हिमाचल के किसान और बागवान भी इससे प्रभावित होंगे, क्योंकि हिमाचल की मुख्य नगदी फसल फल और सब्जियां हैं। इनकी खरीद पर किसी तरह का समर्थन मूल्य नहीं दिया जाता है। इसके अलावा न ही इनके प्रोसेसिंग और स्टोरेज की व्यवस्था है। इसके साथ-साथ पिछले 3-4 वर्षों से एमआईएस स्कीम के तहत केंद्र सरकार के पद प्रदेश के सेब के करोड़ों रुपए लंबित पड़े हैं, जिसे अभी तक भी जारी नहीं किया है। यह प्रदेश के बागवानों के साथ छलावा है। उन्होंने कहा कि हिमाचल में किसानों की मांग है कि जम्मू कश्मीर की तर्ज पर ए ग्रेड के लिए 60 रुपए, बी ग्रेड के 44 रुपए तथा सी ग्रेड के 24 रुपए प्रति किलो की दर से दाम दिए जाए।
जब तक मांग पूरी नहीं होती, जारी रहेगा आंदोलन – पुंडीर
हिमाचल किसान सभा राज्य कोषाध्यक्ष सत्यवान पुंडीर ने कहा कि अगर केंद्र सरकार ने किसानों की मांगें पूरी नहीं की तो यह आंदोलन और तेज किया जाएगा। क्योंकि आज केंद्र की मोदी सरकार ने आज समाज का कोई भी तबका नहीं छोड़ा है, जिस पर भारी बोझ न डाला हो। इसलिए जनता दिन ब दिन लामबंद हो रही है।
