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शिमला। मिड डे मील वर्करज़ यूनियन (सीटू) हिमाचल प्रदेश की राज्य कमेटी की बैठक रीता देवी की अध्यक्षता में किसान मजदूर भवन, चितकारा पार्क कैथू शिमला में आयोजित की गई। बैठक में यूनियन के विभिन्न जिलों से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया और मिड डे मील कर्मियों की मांगों को लेकर आगामी रणनीति पर विस्तार से चर्चा की। बैठक में नरेंद्र विरुद्ध, बालक राम, शांति, राजमिला, रीता, सपना, मीरा खान, रामदास, महेंद्र, मीरा ठाकुर, सुदेश, विनीत, बबीता, सरोज, बिमला, सुलोचना, सरीना, नरेश, भुवनेश्वरी, चम्पा, सुषमा सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे। 

बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि मिड डे मील कर्मियों की मांगों को लेकर 22 जून को प्रदेशव्यापी हड़ताल की जाएगी। उसी दिन छोटा शिमला स्थित प्रदेश सचिवालय के बाहर विशाल प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा, जिसमें प्रदेश भर से हजारों मिड डे मील कर्मी भाग लेंगे।

बैठक को सीटू के प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा, महासचिव प्रेम गौतम, उपाध्यक्ष जगत राम तथा यूनियन की महासचिव शांति देवी ने संबोधित किया। उन्होंने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार और प्रदेश की कांग्रेस सरकार की मिड डे मील कर्मी विरोधी नीतियों के खिलाफ यह आंदोलन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में कार्यरत करीब 21 हजार मिड डे मील कर्मियों की स्थिति बेहद दयनीय है। उन्हें मात्र पांच हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाता है, वह भी कई-कई महीनों तक नहीं मिलता। राज्य और केंद्र सरकार की हिस्सेदारी भी समय पर जारी नहीं की जाती, जिसके कारण कर्मियों को पूरा वेतन नहीं मिल पाता। कई महीनों तक वेतन न मिलने के कारण उनके सामने जीवनयापन का गंभीर संकट खड़ा हो जाता है।

सीटू नेताओं ने बताया कि मिड डे मील वर्कर्स यूनियन द्वारा इस मुद्दे को लेकर हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई थी। इस पर उच्च न्यायालय की सिंगल बैंच ने वर्ष 2019 में और डबल बैंच ने वर्ष 2024 में फैसला देते हुए कहा था कि मिड डे मील कर्मियों को 10 महीने के बजाय 12 महीने का वेतन दिया जाए, लेकिन प्रदेश सरकार ने अभी तक इस निर्णय को लागू नहीं किया है और इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर अपनी मिड डे मील कर्मियों के प्रति विरोधी मानसिकता का परिचय दिया है।

बैठक में यह भी कहा गया कि मिड डे मील कर्मियों को साल में एक भी छुट्टी नहीं मिलती। यदि उन्हें आपात स्थिति, बीमारी या पारिवारिक कारणों से छुट्टी लेनी पड़ती है तो उन्हें अपनी जगह रिलीवर भेजना पड़ता है, जिसकी 500 से 700 रुपये तक की दिहाड़ी का खर्च भी उन्हें स्वयं उठाना पड़ता है। जबकि उन्हें अपने कार्य के बदले मात्र लगभग 150 रुपये के बराबर मानदेय ही मिलता है।

यूनियन नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रारंभिक शिक्षा निदेशक के लिखित आदेशों के बावजूद मिड डे मील कर्मियों से किचन गार्डन तैयार करवाने, झाड़ियां काटने, स्कूलों की साफ-सफाई, पानी की टंकियां साफ करवाने सहित कई प्रकार के अतिरिक्त कार्य करवाए जाते हैं, जिनका उन्हें कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं दिया जाता।

बैठक में सरकार से मांग की गई कि उच्च न्यायालय के फैसले को तुरंत लागू कर मिड डे मील कर्मियों को 12 महीने का वेतन दिया जाए ताकि हजारों कर्मियों को आर्थिक राहत मिल सके। इसके साथ ही कम बच्चों की संख्या वाले स्कूलों को बंद करने या मर्ज करने की स्थिति में वहां कार्यरत मिड डे मील कर्मियों को भी अन्य कर्मचारियों की तरह नजदीकी स्कूलों में समायोजित किया जाए।

यूनियन ने यह भी मांग की कि मिड डे मील कर्मियों को हर महीने की पहली तारीख को वेतन दिया जाए तथा उन्हें वेतन स्लिप भी उपलब्ध करवाई जाए ताकि उन्हें अपने मानदेय की पूरी जानकारी मिल सके। इसके अलावा आंगनबाड़ी कर्मियों की तर्ज पर साल में कम से कम 20 छुट्टियां, वर्ष में दो वर्दियां, चुनाव के दौरान पोलिंग पार्टियों के लिए भोजन बनाने पर अतिरिक्त भुगतान, तथा महिला कर्मियों को रक्षाबंधन, करवाचौथ और भाई दूज पर वेतन सहित अवकाश दिया जाए। बैठक में यह भी मांग उठाई गई कि साधारण और क्लस्टर स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ने की स्थिति में वहां अतिरिक्त मिड डे मील कर्मियों की नियुक्ति की जाए, ताकि कार्य का बोझ कम हो सके। 

By admin

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