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शिमला। पूर्व मंत्री एवं AICC सचिव सुधीर शर्मा ने कहा कि COVID-19 महामारी दुनियाभर में कहर ढा रही है। इस भयानक वायरस का सबसे बुरा असर मानव के अलावा वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। भारत भी इसके प्रभावों से अछूता नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार के कार्यकाल में देश में नोटबंदी के बाद से हालात खराब होते चले गये थे और आज स्थित भयावह हो गई है। 

सुधीर शर्मा ने कहा कि कोविड-19 महामारी और लॉक डाउन के आने से पहले ही हम पूंजी निर्माण के निम्न स्तर से पीड़ित थे। 20 लाख करोड़ रुपए के प्रोत्साहन पैकेज की लंबी गाथा (जो एक महाकाव्य की तरह सभी टीवी चैनल पर 5 दिन के लिए चलाई गई), इनमें से अधिकतर पहले ही तरलता और गारंटी की समस्या से जूझ रहे हैं और इसमें मांग को कोई अभिमान नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा कि 8 क्षेत्रों में सुधार करते हुए प्रधानमंत्री की आत्मनिर्भर भारत योजना महामारी के समय में एक ऐसी योजना है जिसके वित्त पोषण के स्रोत अभी भी सभी के लिए एक रहस्य है। शर्मा ने कहा कि कोविड-19 के समय में सबसे बुरी तरह प्रभावित हुए एमएसएमई क्षेत्र जो कि अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी भी माना जाता है, को तैयार करने के लिए पैकेज में 6 महत्वपूर्ण उपाय बताए गए हैं। उन्होंने कहा कि तनाव से जूझ रहे एमएसएमई सेक्टर के लिए 3 लाख तक के गारंटी बिना ऋण और 45 दिनों के भीतर पुनः राशि का पूर्ण भुगतान इन व्यवसायियों का कोई बड़ी मदद करने नहीं जा रहे हैं। हालांकि यह देखा जाना बाकी है कि क्षेत्र की तात्कालिक आवश्यकता को पूरा करने के लिए वर्तमान स्थिति में क्रेडिट का फ्लो कैसे हो पाता है? मेरे विचार में सरकार इस पर गंभीर नहीं है।
शर्मा ने कहा कि पिछले कई दिनों से सैकड़ों मील की यात्रा करने वाले प्रवासी मजदूरों को इस आर्थिक पैकेज का कोई फायदा नहीं मिला है और निजी क्षेत्र में पहले से ही कर्मचारियों की छंटनी, वेतन में कटौती आदि की मार झेल चुके कर्मचारियों के लिए पैकेज में कोई सहायता नहीं है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने एमएसएमई क्षेत्र के लिए एक विशाल पैकेज की घोषणा की, लेकिन एमएसएमई क्षेत्र में काम करने वाले लगभग 11 करोड़ लोगों के वेतन, वेतन में कटौती या उनके नौकरी की सुरक्षा के बारे में कोई घोषणा नहीं की। इस सेक्टर में काम कर रहे लाखों लोग आज भी थमी सांसों से यह सोचने को मजबूर हैं कि क्या उनकी नौकरी सुरक्षित है या नहीं है और उन्हें उनकी तनख्वाह या मजदूरी का भुगतान किया जाएगा या नहीं हो पाएगा। कामकाजी लोगों और उनके परिवारों के बीच इस वक्त तनावपूर्ण और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।

पूर्व मंत्री ने कहा कि देश में 30 सालों के बाद पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार के बाद किसी अन्य दल ने पूर्ण बहुमत चुनावों में पाया है, लेकिन सरकार और उसके आर्थिक पैकेज ने यह दर्शा दिया है कि उनकी नीतियां और विचार दिशाहीन है और हमें अर्थव्यवस्था के और बुरे दिनों से गुजरना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि दशकों से कृषि हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी रही है, लेकिन इस क्षेत्र को अस्थिर करने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम को संशोधित करने के बजाय इसे खत्म कर दिया। 
शर्मा ने कहा कि इस वर्ष आर्थिक सर्वेक्षण में आवश्यक वस्तु अधिनियम को बेबुनियाद कहते हुए इस को खत्म करने के लिए कहा गया था और कहा गया था कि यह कानून उत्पीड़न की ओर जाता है और मूल्य स्थिरता की जांच करने में कोई मदद नहीं करता है। सर्वेक्षण में गतिशील खाद्य नीति का भी समर्थन किया जो अनाज की खरीद और वितरण से नगद हस्तांतरण तक स्विच करने की अनुमति देता है, लेकिन किसानों की ऋण माफी से वंचित करता है और क्रेडिट संस्कृति को बाधित करता है। वहीं, पैकेज छोटे रिटेल के व्यापारियों की भी कोई सहायता नहीं करता है। उनका कहना था कि एक उद्योग सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 12 मिलियन खुदरा विक्रेता  40 मिलियन लोगों को रोजगार देते हैं और 700 बिलियन रुपए का कारोबार करते हैं। वर्तमान समय में जबकि सभी दुकानें बंद थी या यह आवश्यक वस्तुओं का वितरण नहीं कर रहे थे या सौ फीसदी क्षमता के साथ काम नहीं कर रहे थे या वस्तुओं की आपूर्ति न होने के कारण बिक्री नहीं कर पा रहे थे, फिर भी उन्हें विभिन्न प्रकार की समस्याओं से जूझना पड़ रहा था और उन्हें अपने व्यवसाय को चलाने के लिए किराया, बिजली का बिल जैसे फिक्स्ड कोष का भुगतान करना ही पड़ा।
शर्मा ने कहा कि किराना स्टोर को संचालित करने के लिए नकद मुद्रा की आवश्यकता होती है, लेकिन लोकडउन के दौरान किराना व्यापारियों के पास नकद मुद्रा नहीं थी और उपभोक्ताओं का रुझान भी ई-कॉमर्स गतिविधियों की तरफ बढ़ रहा था। उन्होंने कहा कि सरकार की राहत तो राजकोषीय प्रोत्साहन योजना मार्च के अंत से चल रही है और यह स्पष्ट नहीं है कि सब वंचित और बिना रुके प्रोत्साहन पैकेज को तैयार करने में इतना लंबा समय क्यों लगा यह कुछ समय है। जब सरकार अपने वर्तमान पैकेज में संशोधन करती है और ऐसे उपाय के साथ आती है, लोग कोविड-19 और भारतीय अर्थव्यवस्था अवसाद से बाहर निकल सके अन्यथा इस पैकेज का कोई महत्व नहीं रह जाएगा।

By admin

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