शिमला। SFI हिमाचल प्रदेश राज्य कमेटी ने मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को विभिन्न छात्र मांगों को लेकर ज्ञापन सौंपा। इसमें कुलपति की अयोग्यता व विश्वविद्यालय में अध्यापकों की भर्तियों में नियमों का पालन न करने पर प्रश्न उठाए।
केंद्रीय विश्वविद्यालय व हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में हो रही शिक्षकों की भर्तियों में केंद्र व प्रदेश सरकार अपने चहेतों को भर्ती कर रही है। UGC के नियम व निर्देशों को दरकिनार कर आयोग्य लोगों को भर्ती किया जा रहा है, जो शिक्षा की गुणवत्ता व छात्रों के भविष्य के साथ एक बहुत बड़ा खिलवाड़ किया जा रहा है।
SFI राज्य कमेटी ने विश्वविद्यालय कुलपति की योग्यता पर सवाल उठाते हुए बताया कि राइट टू इनफार्मेशन एक्ट के तहत जो जानकारी हासिल हुई है, उसके मुताबिक कुलपति के पद पर नियुक्ति के लिए यूजीसी के नियमों तथा विश्वविद्यालय अध्यादेश अनुसार 10 साल का अनुभव बतौर प्रोफेसर किसी भी प्राध्यापक के पास होना चाहिए, लेकिन हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के कुलपति ने फर्जी अनुभव के दस्तावेजों का सहारा लेकर विश्वविद्यालय में नियुक्ति हासिल की है। इसलिए SFI राज्य कमेटी मांग करती है कि अयोग्य कुलपति प्रोफेसर सिकंदर कुमार पर भर्ती प्रक्रिया के दौरान गलत जानकारी साझा करने के आरोप में IPC की धारा 420 के तहत मुकदमा दर्ज होना चाहिए तथा शीघ्र ही उन्हें पद से हटाया जाना चाहिए।
SFI के राज्य सचिव अमित ठाकुर व राज्य अध्यक्ष रमन थारटा ने कहा कि 21 मार्च 2011 में विश्वविद्यालय के अंदर सिकंदर कुमार को ईसी द्वारा प्रोफेसर पद पदोन्नत किया गया और अगस्त 2018 में विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया। इस तरह से सिकंदर कुमार के पास सिर्फ 7 साल 5 महीने का अनुभव था जोकि अनुभव सीमा 10 साल से 2 साल 7 महीने कम है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि जब विश्वविद्यालय का कुलपति ही नियमों की अनियमितताओं से नियुक्त हुआ है। उनका कहना था कि वीसी ने दस्तावेजों में हेर फेर की है और इससे सर्च कमेटी को वीसी के अनुभव को लेकर अंधेरे में रखा गया। उसके बावजूद प्रदेश सरकार ने किस आधार पर वीसी के कार्यकाल को एक बर्ष तक बढ़ा दिया गया। अपने कार्यकाल के दौरान वीसी ने महामारी के दौरान नियमों को ताक पर रखकर विश्वविद्यालय में भर्तियां की गई। फर्नीचर के नाम पर या फिर भर्तियों के नाम पर इस तरह के घोटाले निकल कर सामने आना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। क्योंकि वीसी की नियक्ति ही गैर कानूनी तरीके से हुई है।
इसके साथ-साथ एसएफआई ने राज्यपाल तथा उच्च न्यायालय से इस मसले पर प्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप करने की मांग की है, ताकि सच्चाई सबके सामने आ सके। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के अंदर लगातार बेरोजगार नौजवानों के साथ धोखा हो रहा है तथा योग्यता को दरकिनार करते हुए एक विशेष विचारधारा के लोगों की भर्तियां शिक्षक तथा गैर शिक्षक वर्ग के अंदर की जा रही है। प्रदेश सरकार व वीसी के खिलाफ सूचना अधिकार के तहत सूचना एकत्र करने वाले याचिकर्ताओं की पूरी सूचना अपने आफिस इसलिए मंगवाई जा रही है ताकि याचिकाकर्ता को डराया या दवाब डालने की कोशिश की जाए। जो सूचना अधिकार के कानून का उलंघन है।SFI नेताओं ने कहा कि पीटीए के नाम पर भी छात्रों से भारी भरकम फीस वसूली जा रही है। पीटीए का गठन स्कूलों और महाविद्यालयों में इसलिए किया जाता है, ताकि शिक्षा में सबकी भागेदारी सुसीश्चित की जाए। परन्तु सरकार ने पीटीए को को शोषण का साधन बना दिया है। सभी प्रकार की भर्तियां पीटीए के तहत की जा रही है, जबकि सरकार की जिम्मेवारी थी कि खाली पदों को भरा जाए, शिक्षा का बजट बढ़ाकर शिक्षण संस्थानों बहेतर बनाया जाए। परन्तु सरकार ने यह सारा कार्य छात्रों और अभिभावकों पर डाला जा रहा है। उनकी मांग है कि पीटीएके नाम भारी फीस वसूली ना की जाए। और पीटीए के आय – व्यय का ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए।
एसएफआई नेताओं ने कहा कि छात्र संघ चुनावों को प्रदेश में 2014 से प्रतिबंध लगाया गया है। तब से लेकर आज तक छात्र समुदाय छात्र संघ चुनाव को बहाल करने के लिए निरंतर संघर्ष करता रहा है। छात्र संघ चुनाव के माध्यम से छात्रों की समस्याएं प्रशासन तक पहुंचाने में एससीए एक अहम भूमिका निभाता था, लेकिन जब से छात्र संघ चुनाव पर प्रतिबंध लगाया गया है। उसके बाद छात्रों की समस्याओं को प्रशासन दरकिनार करता आ रहा है। छात्र संघ चुनाव विश्वविद्यालय व महाविद्यालयों में छात्रों की लोकतांत्रिक प्रणाली को वह छात्रों में राजनीति की समझ को विकसित करती थी। इसलिए एसएफआई लंबे समय से छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकार वह छात्रों को आ रही समस्याओं से निपटने के लिए छात्र संघ चुनाव बहाल की जाए।
