शिमला। नेशनल कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लॉइज़ एंड इंजीनियर्स के आह्वान पर वीरवार को राज्य बिजली बोर्ड कर्मचारियों ने अपने मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन किया। इस दौरान केंद्र सरकार की बिजली क्षेत्र में निजीकरण की नीतियों के खिलाफ पूर्ण रूप से पेन डाउन एवं टूल डाउन हड़ताल रही। इसका प्रभाव कार्यालयों के साथ-साथ फील्ड कार्यों में भी स्पष्ट रूप से देखने को मिला। हालांकि, आपातकालीन सेवाओं को हड़ताल से बाहर रखा गया, जिससे आम जनता को आवश्यक सेवाओं में कोई बाधा नहीं हुई।
भोजनावकाश के दौरान प्रदेशभर में बिजली बोर्ड कार्यालयों के बाहर 63 जगहों पर निजीकरण के विरोध में जोरदार प्रदर्शन किए गए। कुछ जगहों पर प्रशासन के माध्यम से केंद्र सरकार को ज्ञापन भी सौंपे गए, जिनमें बिजली बोर्ड के पेंशनरों के साथ-साथ विद्युत उपभोक्ताओं ने भी भाग लिया। शिमला में बोर्ड मुख्यालय के बाहर सैकड़ों कर्मचारियों, अभियंताओं व पेंशनर्ज जोरदार प्रदर्शन किया।
प्रदेश में यह विरोध प्रदर्शन हिमाचल प्रदेश स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के कर्मचारियों, अभियंताओं और पेंशनभोगियों के संगठनों की ज्वाइंट एक्शन कमेटी के आह्वान पर आयोजित किया गया। प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 सहित हिमाचल प्रदेश के विद्युत क्षेत्र से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार का ध्यान आकर्षित करना था। वहीं, प्रदेश के वित्त सचिव के राज्य बिजली बोर्ड के निजीकरण के बयान की भी कड़ी निंदा की गई और कहा निजीकरण के किसी भी प्रयास का डटकर विरोध किया जाएगा।
ज्वाइंट एक्शन कमेटी ने कहा कि केंद्र सरकार लगातार राज्य सरकारों पर बिजली कंपनियों के निजीकरण के लिए दबाव बना रही है। इसी दिशा में बिजली कानून में कई संशोधन प्रस्तावित किए जा चुके हैं। हाल ही में ऊर्जा मंत्रालय द्वारा विद्युत संशोधन विधेयक, 2025 का मसौदा लाया गया है, जिसे इस बजट सत्र में संसद में पेश किए जाने की संभावना है।
ज्वाइंट एक्शन कमेटी के संयोजक इंजीनियर लोकेश ठाकुुर और सह संयोजक हीरा लाल वर्मा ने बताया कि जिन राज्यों में बिजली वितरण का कार्य निजी हाथों में सौंपा गया है, वहां यह प्रयोग अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका है। इससे उपभोक्ताओं के साथ-साथ राज्य सरकारों को भी वित्तीय एवं प्रशासनिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। इसके बावजूद केंद्र सरकार शेष सरकारी बिजली कंपनियों को भी प्रतिस्पर्धा के नाम पर निजी हाथों में देने के प्रयास कर रही है।
उन्होंने कहा कि प्रस्तावित विधेयक में एक ही क्षेत्र में अनेक वितरण कंपनियों को कार्य करने की अनुमति देने तथा सरकारी बिजली बोर्ड के नेटवर्क का उपयोग निजी कंपनियों को उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है। साथ ही, मध्यम एवं निम्न वर्ग के उपभोक्ताओं को दी जा रही क्रॉस सब्सिडी समाप्त करने का प्रस्ताव है। दूसरी ओर, दूरदराज एवं जनजातीय क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति की जिम्मेदारी सरकारी कंपनी पर ही रखी गई है। इसे राज्य सरकारों की संघीय शक्तियों को कमजोर करने का प्रयास भी बताया गया।
लोकेश ठाकुर और हीरा लाल वर्मा ने यह भी कहा कि प्रदेश में बिजली क्षेत्र युवाओं के रोजगार का एक बड़ा स्रोत है। निजीकरण से रोजगार के अवसरों में भारी कमी आएगी। वर्तमान में बोर्ड के कुल राजस्व का लगभग 64 प्रतिशत औद्योगिक उपभोक्ताओं से आता है। यदि यह वर्ग निजी कंपनियों के पास चला जाता है, तो सरकारी बिजली कंपनी की वित्तीय स्थिति गंभीर रूप से प्रभावित होगी। इससे कर्मचारियों की सेवा शर्तें, पेंशन भुगतान और भविष्य की सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने केंद्र सरकार की स्मार्ट मीटरिंग योजना का भी विरोध किया और कहा कि इसका भारी वित्तीय बोझ प्रदेश की जनता पर डाला जा रहा है, जबकि इसका लाभ भविष्य में निजी कंपनियों को मिलेगा।
ज्वाइंट एक्शन कमेटी ने स्पष्ट किया कि बिजली बोर्ड का निजीकरण करने के बजाय उसे मजबूत करने की आवश्यकता है। कर्मचारियों की कमी को दूर करने के लिए नई भर्ती की जाए, कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाने को पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) लागू की जाए और 10-12 वर्षों से कार्यरत आउटसोर्स कर्मियों के लिए स्थायी नीति बनाई जाए। साथ ही, लंबित सेवानिवृत्ति लाभों का तत्काल भुगतान करने की मांग भी दोहराई गई। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई केवल कर्मचारियों की नहीं, बल्कि अभियंताओं, कर्मचारियों, आउटसोर्स कर्मियों, पेंशनरों और उपभोक्ताओं सभी की है। यदि केंद्र सरकार निजीकरण की दिशा में आगे बढ़ती है तो प्रदेश की जनता के साथ मिलकर इस सार्वजनिक ढांचे को बचाने के लिए व्यापक आंदोलन किया जाएगा।
