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विवि भर्ती विधेयक का किया विरोध, कहा- विश्वविद्यालय की स्वायत्तता कमजोर करने के बजाय तय हो जिम्मेदारी 

शिमला। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने हिमाचल प्रदेश के विश्वविद्यालयों, विशेषकर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू), में शिक्षकों की भर्ती का अधिकार विश्वविद्यालयों से लेकर राज्य लोक सेवा आयोग को सौंपने के विधेयक का विरोध किया है। माकपा के राज्य सचिव संजय चौहान ने कहा कि भर्ती में कथित अनियमितताओं को दूर करने के नाम पर विश्वविद्यालय की अकादमिक स्वायत्तता को कमजोर करना उचित नहीं है। उन्होंने 2020 से 2023 के बीच एचपीयू में हुई 186 शिक्षक नियुक्तियों की स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग की है।

संजय चौहान ने कहा कि हाल ही में प्रस्तुत सीएजी की Compliance Audit Report No. 4 of 2025 में एचपीयू के कामकाज और शिक्षक भर्ती प्रक्रिया को लेकर गंभीर टिप्पणियां की गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार 2020 से 2023 के दौरान विश्वविद्यालय में 186 शिक्षकों की नियुक्तियां हुईं। सीएजी ने पाया कि इन नियुक्तियों से संबंधित EWS प्रमाण-पत्रों, शैक्षणिक योग्यताओं और अन्य दस्तावेजों का संबंधित जारीकर्ता प्राधिकरणों से सत्यापन किए जाने का रिकॉर्ड ऑडिट के समक्ष उपलब्ध नहीं कराया गया। उन्होंने कहा कि सीएजी ने UGC नियमों के अनुपालन को लेकर भी सवाल उठाए हैं। ऑडिट में एक ऐसे असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति का उल्लेख किया गया है, जिसके पास आवेदन की अंतिम तिथि तक निर्धारित योग्यता नहीं थी। इसके अलावा एक गेस्ट फैकल्टी की नियुक्ति में भी निर्धारित पात्रता मानदंड पूरे नहीं होने की बात सामने आई है।

माकपा नेता ने कहा कि इस मामले को केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार एचपीयू में भर्ती प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में सवाल उठते रहे हैं। भाजपा सरकार को अपने कार्यकाल के दौरान लिए गए भर्ती संबंधी फैसलों का जवाब देना चाहिए, वहीं कांग्रेस सरकार को भी स्पष्ट करना चाहिए कि विपक्ष में रहते हुए जिन नियुक्तियों पर सवाल उठाए गए थे, सत्ता में आने के बाद उनकी स्वतंत्र जांच क्यों नहीं करवाई गई।

चौहान ने मांग की कि किसी वर्तमान या सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अध्यक्षता में समयबद्ध न्यायिक जांच आयोग गठित किया जाए। जांच में 186 नियुक्तियों में प्रत्येक अभ्यर्थी की पात्रता, EWS और शैक्षणिक प्रमाण-पत्रों का सत्यापन, UGC नियमों का पालन, स्क्रीनिंग-कम-इवैल्यूएशन कमेटियों और चयन समितियों की भूमिका तथा कुलपति और अन्य वैधानिक प्राधिकरणों की जिम्मेदारी की जांच होनी चाहिए। साथ ही भर्ती प्रक्रिया में किसी भी राजनीतिक या प्रशासनिक हस्तक्षेप की भी जांच की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सीएजी के अनुसार 2020 से 2023 के दौरान एचपीयू में शिक्षकों की कमी 27 से 37 प्रतिशत के बीच रही। ऐसे में यह और महत्वपूर्ण हो जाता है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि शिक्षक नियुक्तियां निर्धारित कानून, UGC नियमों और अकादमिक मानदंडों के अनुसार ही हुई थीं।

संजय‌ चौहान ने कहा कि यदि भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार, कदाचार या नियमों का उल्लंघन हुआ है तो दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। भ्रष्टाचार से निपटने के नाम पर विश्वविद्यालय की भर्ती शक्तियां किसी दूसरी नौकरशाही संस्था को सौंपना इसका समाधान नहीं है। इससे केवल भर्ती अधिकार का केंद्र बदल जाएगा और अनियमितताओं के मूल कारणों का समाधान नहीं होगा। उन्होंने सरकार से मांग की कि पूरे मामले को हिमाचल प्रदेश विधानसभा के समक्ष रखा जाए और संबंधित सभी अभिलेख जांच के लिए उपलब्ध करवाए जाएं। जहां वित्तीय अथवा अन्य अनियमितता साबित हो, वहां धन की वसूली के साथ कानूनी कार्रवाई की जाए।

संजय चौहान ने कहा कि न भाजपा और न ही कांग्रेस इस मामले में जवाबदेही से बच सकती है। उन्होंने कहा कि यदि भर्ती नियमों का उल्लंघन हुआ है तो राजनीतिक संबद्धता से परे जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि 186 नियुक्तियों की स्वतंत्र जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए, लेकिन भर्ती अनियमितताओं के नाम पर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की अकादमिक स्वायत्तता को कमजोर न किया जाए।

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