Spread the love

शिमला।  26 नवंबर 2020 को होने वाली राष्ट्रव्यापी हड़ताल के सिलसिले में केंद्रीय ट्रेड यूनियनों व राष्ट्रीय फेडरेशनों के हिमाचल प्रदेश के संयुक्त मंच की बैठक सीटू कार्यालय शिमला में सम्पन्न हुई। बैठक में मंच के संयोजक व सीटू राष्ट्रीय सचिव डॉ. कश्मीर ठाकुर, इंटक प्रदेशाध्यक्ष बाबा हरदीप सिंह, एटक प्रदेशाध्यक्ष जगदीश भारद्वाज, सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा, केंद्रीय कर्मचारी समन्वय समिति के चेयरमैन परषोतम चौहान, एजी ऑफिस कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष बलबीर सूरी, नॉर्थ जोन इंश्योरेंस एम्प्लॉईज़ एसोसिएशन अध्यक्ष सुभाष भट्ट, ऑल इंडिया ऑडिट एंड अकाउंट्स पेंशनर्ज़ एसोसिएशन राष्ट्रीय महासचिव जगमोहन ठाकुर, ऑल इंडिया रोड़ ट्रांसपोर्ट वर्करज़ फेडरेशन अध्यक्ष लेखराम वर्मा, हिमाचल प्रदेश प्राइवेट बस ड्राइवर कंडक्टर यूनियन चेयरमैन विकास राणा, उपाध्यक्ष रूप लाल, एक्स सर्विस मैन यूनियन बरमाणा नेता करनैल सिंह चन्देल, बागा भलग ट्रांसपोर्ट यूनियन अध्यक्ष कैप्टन सुरेंद्र सिंह, एजी ऑफिस कर्मचारी यूनियन नेता नेत्र चौहान, धर्मपाल, वीरेंद्र वर्मा, रतन चन्द, पोस्टल यूनियन नेता कमल किशोर, प्रेम मेहता, राम लाल शर्मा, हिमाचल विश्वविद्यालय क कर्मचारी नेता नरेश शर्मा, ललित चौहान, बीमा यूनियन नेता प्रेम दास, 108 एम्बुलेंस कर्मचारी यूनियन चेयरमैन पूर्ण चन्द, इंटक नेता बीएस चौहान, भारत भूषण, एटक नेता अनूप शर्मा, सीटू नेता जगत राम सहित दर्जनों नेता शामिल रहे।
संयुक्त मंच ने ऐलान किया है कि 26 नवंबर को देश के करोड़ों मजदूरों व कर्मचारियों द्वारा मोदी सरकार की मजदूर, कर्मचारी व किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी हड़ताल की जाएगी। इस दिन हिमाचल प्रदेश के सभी उद्योग व संस्थान बंद रहेंगे तथा मजदूर व कर्मचारी सड़कों पर उतरकर आंदोलन करेंगे। हड़ताल को सफल बनाने के लिए इस से पूर्व ब्लॉक, जिला व राज्य स्तर पर ट्रेड यूनियनों व कर्मचारी फेडरेशनों की संयुक्त बैठकें होंगी। 

ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच के हिमाचल प्रदेश के संयोजक डॉ. कश्मीर ठाकुर, इंटक प्रदेशाध्यक्ष बाबा हरदीप सिंह, एटक प्रदेशाध्यक्ष जगदीश भारद्वाज व सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि 26 नवंबर को राष्ट्रीय आह्वान पर हिमाचल प्रदेश के सभी उद्योगों व संस्थानों में हड़ताल रहेगी। इस दिन सभी जिला, ब्लॉकों व स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन होंगे। प्रदेश के लाखों मजदूर सड़कों पर उतरकर केंद्र की मोदी सरकार व प्रदेश सरकार की मजदूर व कर्मचारी विरोधी नीतियों के खिलाफ हल्ला बोलेंगे। उन्होंने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार पूंजीपतियों के हित में कार्य कर रही है व मजदूर विरोधी निर्णय ले रही है। पिछले सौ साल के अंतराल में बने 44 श्रम कानूनों को खत्म करके मजदूर विरोधी चार श्रम संहिताएं अथवा लेबर कोड बनाना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कोरोना काल का फायदा उठाते हुए मोदी सरकार के नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश जैसी कई राज्य सरकारों ने आम जनता, मजदूरों व किसानों के लिए आपदाकाल को पूंजीपतियों व कॉरपोरेट्स के लिए अवसर में तब्दील कर दिया है। इन नेताओं ने कहा कि मजदूरों के 44 कानूनों को खत्म करने, सार्वजनिक क्षेत्र को बेचने के साथ ही किसान विरोधी तीन कानूनों को पारित करने से यह साबित हो गया है कि ये सरकार मजदूर, कर्मचारी व किसान विरोधी है। यह सरकार लगातार गरीबों के खिलाफ कार्य कर रही है। सरकार के इन निर्णयों से 80 करोड़ से ज़्यादा मजदूर व किसान सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। सरकार फैक्टरी मजदूरों के लिए 12 घंटे के काम करने के आदेश जारी करके उन्हें बंधुआ मजदूर बनाने की कोशिश कर रही है। आंगनबाड़ी, आशा व मिड डे मील योजनकर्मियों के निजीकरण की साज़िश की जा रही है। नई शिक्षा नीति से योजनकर्मी बर्बाद हो जाएंगे। उन्हें वर्ष 2013 के 45वें श्रम सम्मेलन की सिफारिश अनुसार नियमित कर्मचारी घोषित नहीं किया जा रहा है। इन नेताओं ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 26 अक्तूबर 2016 को समान कार्य के लिए समान वेतन के आदेश को आउटसोर्स,ठेका,दिहाड़ीदार मजदूरों के लिए लागू नहीं किया जा रहा है। केंद्र व राज्य के मजदूरों को एक समान वेतन नहीं दिया जा रहा है। हिमाचल प्रदेश के मजदूरों के वेतन को महंगाई व उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के साथ नहीं जोड़ा जा रहा है। सातवें वेतन आयोग व 1957 में हुए 15वें श्रम सम्मेलन की सिफारिश अनुसार उन्हें 21 हज़ार रुपये वेतन नहीं दिया जा रहा है। मोटर व्हीकल एक्ट में मालिक व मजदूर विरोधी परिवर्तनों से वे रोज़गार से वंचित हो जाएंगे व  विदेशी कम्पनियों का बोलबाला हो जाएगा। मोदी सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों के कारण कोरोना काल में 15 करोड़ मजदूरों की नौकरियां चली गयी हैं व वे बेरोज़गार हो गए हैं। मजदूरों को नियमित रोज़गार से वंचित करके फिक्स टर्म रोज़गार की ओर धकेला जा रहा है। वर्ष 2003 के बाद नौकरी में लगे कर्मचारियों का नई पेंशन नीति के माध्यम से शोषण किया जा रहा है।

कामगारों की यें हैं मांगें 

मजदूर नेताओं ने मांग की कि मजदूरों का न्यूनतम वेतन 21 हज़ार रुपये घोषित किया जाए। केंद्र व राज्य का एक समान वेतन घोषित किया जाए। किसान विरोधी हाल ही में पारित किए गए तीनों कानून को रद्द किया जाए व किसानों की फसल के लिए स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशें लागू की जाएं। आंगनबाड़ी, मिड डे मील, आशा व अन्य योजना कर्मियों को सरकारी कर्मचारी घोषित किया जाए व नई शिक्षा नीति को वापिस लिया जाए। मनरेगा में 200 दिन का रोज़गार दिया जाए व राज्य सरकार द्वारा घोषित 275 रूपए न्यूनतम दैनिक वेतन लागू किया जाए। श्रमिक कल्याण बोर्ड में मनरेगा व निर्माण मजदूरों का पंजीकरण सरल किया जाए। मजदूरों की पेंशन तीन हज़ार रुपये की जाए व उनके सभी लाभों में बढ़ोतरी की जाए। कॉन्ट्रैक्ट, फिक्स टर्म, आउटसोर्स व ठेका प्रणाली की जगह नियमित रोज़गार दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयानुसार समान काम का समान वेतन दिया जाए। नई पेंशन नीति (एनपीएस) की जगह पुरानी पेंशन नीति (ओपीएस) बहाल की जाए। बैंक, बीमा, बीएसएनएल, रक्षा, बिजली, परिवहन, पोस्टल, रेलवे, एनटीपीएस, एनएचपीसी, एसजेवीएन, कोयला, बंदरगाहों, एयरपोर्टों, सीमेंट, शिक्षा, स्वास्थ्य व अन्य सार्वजनिक उपक्रमों का विनिवेश व निजीकरण बन्द किया जाए। मोटर व्हीकल एक्ट में परिवहन मजदूर व मालिक विरोधी धाराओं को वापिस लिया जाए। 44 श्रम कानून खत्म करके मजदूर विरोधी चार श्रम संहिताएं (लेबर कोड) बनाने का निर्णय वापिस लिया जाए। सभी मजदूरों को ईपीएफ, ईएसआई,ग्रेच्युटी, नियमित रोज़गार, पेंशन, दुर्घटना लाभ आदि सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया जाए। भारी महंगाई पर रोक लगाई जाए। पेट्रोल, डीज़ल, रसोई गैस की कीमतें कम की जाएं। रेहड़ी, फड़ी तहबाजारी क़े लिए स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट को सख्ती से लागू किया जाए। सेवारत महिला कर्मचारियों को दो वर्ष की चाइल्ड केयर लीव दी जाए। सेवारत कर्मचारियों की पचास वर्ष की आयु व 33 वर्ष की नौकरी के बाद जबरन रिटायर करना बंद किया जाए। सेवाकाल के दौरान मृत कर्मचारियों के आश्रितों को बिना शर्त करूणामूलक आधार पर नौकरी दी जाए। 

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You missed